राजस्थान की पहली चुनी हुई सरकार के मुख्यमंत्री : टीकाराम पालीवाल

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बात राजस्थान के उस मुख्यमंत्री की, जो राजस्थान की पहली सरकार में राजस्व मंत्री थे. जो आगे चलकर राजस्थान की पहली चुनी हुई सरकार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन कुछ ही वक्त के बाद सरकार के डिप्टी बने और फिर डिप्टी ही रह गए. नाम था टीकाराम पालीवाल.

टीकाराम पालीवाल: जो मुख्यमंत्री बनने के बाद उपमुख्यमंत्री बने

साल 1952. जयपुर में एक जगह है खेजड़ों का रास्ता. करीब 20-30 लोग अपने हाथों में तलवारें और बंदूकें लिए आगे बढ़े जा रहे थे. यहां एक गली में था गोविंदनारायण झालानी का घर. ये सब लोग इस घर के बरामदे में पहुंचे और चिल्लाने लगे- चौधरी टीकाराम कहां है? इस घर का नौकर आया और बोला- साहब नहाकर आ रहे हैं, आप लोग गेस्ट रूम में बैठ जाइए. 5-7 मिनट बाद ही सफेद धोती और बनियान पहने हुए एक आदमी उस कमरे में आया और कहा- बताइए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं? एक आदमी खड़ा होकर बोला- साहब, ऐसा नहीं होगा और होगा तो बहुत खून बह जाएगा. खून बहने की धमकी सुनकर टीकाराम भी गुस्से में आ गए. वो बोले- आप लोग मुझे डराने धमकाने आए हो क्या? आपकी जो ये तलवार है न, इसके ऊपर मखमल की म्यान तो है लेकिन इसमें अंदर जंग लगा हुआ है. मैं आपकी धमकी से डरने वाला नहीं हूं. यह सुनकर तलवार दिखाने वाला आदमी नरम पड़ गया और बोला- हम ये नहीं कह रहे कि हम आप पर तलवार चलाएंगे और खून बहाएंगे. हम तो सत्याग्रह करेंगे जिस पर आपकी सरकार गोली चलवाएगी और हमारा खून बहेगा. धमकी देने आए ये लोग पालीवाल के तेवर देख बस एक रिक्वेस्ट कर यहां से चले गए. ये राजस्थान के जागीरदार थे. ये सरकार के बेगारी प्रथा और जागीरदारी के खिलाफ लिए फैसलों से खफा थे.

और इनके सामने जो सफेद धोती और बनियान पहने आदमी खड़ा था, वो था राजस्थान की पहली सरकार में राजस्व मंत्री टीकाराम पालीवाल. जो आगे चलकर राजस्थान की पहली चुनी हुई सरकार के मुख्यमंत्री बने. मगर बने नहीं रह पाए. डिप्टी थे सो फिर डिप्टी ही रह गए.

टीकाराम पालीवाल(Tikaram Paliwal) फिलहाल के दौसा जिले में महवा (महुआ बोला जाता है) तहसील के मुंडावर में 24 अप्रैल, 1907 में पैदा हुए थे. तब गांव में स्कूल नहीं होते थे तो शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई. 13 साल की उम्र में पढ़ाई करने अलवर हाईस्कूल में चले गए. एक दिन स्कूल में एक लड़का गांधी टोपी पहनकर आ गया. जमाना अंग्रेजों का था तो गांधी टोपी को एक सरकारी कर्मचारी कैसे झेल लेता. स्कूल के प्रिंसिपल ने इस लड़के को बुलाकर पीटा और स्कूल से निकाल दिया. टीकाराम ने ये सब देखा. अगले दिन स्कूल के अधिकतर बच्चे गांधी टोपी पहनकर आ गए. ये देखकर स्कूल के प्रिंसिपल तमतमा गए. प्रिंसिपल ने सब बच्चों को पैरेंट्स लाकर ही स्कूल वापस आने को कहा. इस स्कूल में टीकाराम का ये आखिरी दिन था. उसके आईडिया पर ही ये बच्चे गांधी टोपी लगाकर पहुंचे थे. टीकाराम वापस घर पहुंचे और वहां जाकर दिल्ली के नेशनल स्कूल में पढ़ने जाने की बात की. 1921 में दिल्ली पहुंचकर नेशनल स्कूल में एडमिशन लिया. यहीं मुलाकात हो गई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता आसिफ अली से. 1927 में टीकाराम उसी नेशनल स्कूल में टीचर लग गए. लेकिन वो आजादी के आंदोलन से जुड़े रहे.

1930, गांधीजी का नमक सत्याग्रह शुरू हो चुका था. टीकाराम भी तब तक मास्टरी छोड़ सामाजिक काम में जुट गए थे. यूथ लीग नाम की संस्था बनाकर. लीग ने तय किया. कांग्रेस के बड़े नेताओं संग जुटेंगे. यमुना का पानी लेकर आएंगे और उसे खौलाकर नमक बनाएंगे. तकनीकी रूप से विषम कार्य, मगर यहां बात जज्बे की थी.

यमुना ब्रिज के पास पुलिस ने योजना को अमल में लाने के लिए पहुंचे जत्थे को रोक लिया. पुलिस के पास एक लिस्ट थी जिसमें से पढ़कर कुछ नाम बोले गए. ये नेता थे. गिरफ्तार कर सब ट्रक में बिठा लिए गए. पुलिस को लगा कि अब जब लीडरशिप ही नहीं तो लोग बिखर जाएंगे.

मगर सूची में नौजवान टीकाराम का नाम नहीं था. पुलिस के जाने के बाद पालीवाल और उनके यूथ लीग के साथियों ने मोर्चा संभाला. जुलूस निकाला और कंपनी बाग में सभा की. अब टीकाराम भी अंग्रेजों की नजर में चढ़ गए.

फिर गिरफ्तार हुए. पत्रकारिता के फेर में. दरअसल उन दिनों अंग्रेजों ने दिल्ली में अखबारों पर बैन लगा दिया था. ऐसे में कांग्रेस ने कांग्रेस मीटिंग नाम से एक बुलेटिन निकालना शुरू किया. हिंदी, उर्दू और इंग्लिश में. हिंदी बुलेटिन टीकाराम के जिम्मे. जल्द पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया.

अगस्त, 1930 में पालीवाल और उनके साथियों पर ट्रायल शुरू हुआ. जज का नाम था एफ. बी. पुल. अंग्रेज था. जिरह शुरू हुई तो पालीवाल और उनके साथियों की तरफ से कोई वकील नहीं था. ऐसे में अंग्रेज वकील ने अपने तर्क दिए और जज ने सजा सुनाना शुरू किया. टीकाराम बीच में बोल पड़े और जज से जिरह करना शुरू कर दिया. इस दस मिनट की जिरह के बाद अदालत में तालियां बजने लगीं. टीकाराम के तर्कों के बाद जज बस चार महीने जेल की सजा सुना सका.

जेल में इस घटना के खूब चर्चे हुए. जेल में बंद क्रांतिकारियों ने टीकाराम से कहा, मास्टरी छोड़ो वकालत पढ़ो. सजा काट दिल्ली पहुंचे पालीवाल ने ऐसा ही किया. मेरठ के लॉ कॉलेज में एडमिशन लिया. फिर डिग्री मिली तो राजस्थान के हिंडोन आकर वकालत शुरू कर दी.

वकील टीकाराम एक बार फिर आजादी के आंदोलन में सक्रिय हो गए. उन्होंने अपना बेस हिंडोन से जयपुर कर लिया. यहां वह प्राजमंडल में सक्रिय हो गए. प्रजामंडल यानी रियासतों में कांग्रेस का स्वरूप. यहीं पर पालीवाल की नजदीकी राजस्थान के पहले सीएम और वनस्थली निर्माता हीरालाल शास्त्री से हुए.

आजादी के बाद शास्त्री की राज्य में सरकार बनी तो टीकाराम उसमें राजस्व मंत्री बने. तभी पालीवाल ने बेगारी प्रथा और जागीरदारी को खत्म करने का प्रस्ताव रखा. शास्त्री दम नहीं जुटा पा रहे थे, मगर पालीवाल ने जोर दिया तो मान गए.

फिर जागीरदारी खत्म हो गई. और इसी से रोष में आए लोग तलवार लेकर पालीवाल के घर पहुंच गए. उन्हें अजीब लगा, जो अपना लगता था. जिसे वो चौधरी टीकाराम कहते थे, वहीं उनका वर्चस्व खत्म करने पर लगा था. मगर ये नए मुल्क की नई सुबह थी. पुरानी चीजों को जाना ही था.

नई चीजों में चुनाव भी थे. देश में पहली बार चुनाव हुए. 1952 में. लोकसभा और विधानसभा के लिए. राजस्थान में जब इसके नतीजे आए तो मुख्यमंत्री जयनारायण व्यास दोनों सीटों से हार गए. व्यास को शास्त्री के बाद राजस्थान का मुख्यमंत्री बनाया गया था. उन्हीं के नेतृत्व में कांग्रेस राज्य में पहले चुनाव में उतरी थी. चुनाव पहले की व्यास कैबिनेट में पालीवाल सिर्फ मंत्री भर नहीं थे. डिप्टी सीएम भी बनाए दिए गए थे.

इसलिए जब सीएम साहब यानी व्यास हारे तो उनके डिप्टी यानी टीकाराम को सीएम बना दिया गया. वैसे भी इन चुनावों में टीका बीस साबित हुए थे. उनके पॉलिटिकल बॉस व्यास जहां दोनों सीटें हारे थे, वहीं टीकाराम महवा (महुआ बोला जाता है) और मलारना चौर, दोनों जगहों से जीते थे.

पालीवाल सीएम बने. जयनारायण के चेलों ने डे वन से उनका विरोध शुरू कर दिया. व्यास भी बस उपचुनाव भर का इंतजार कर रहे थे. वे हुए, जिसमें व्यास जीतकर विधायक बने और फिर सीएम भी.व्यास ने एक बार फिर पालीवाल को अपना डिप्टी बनाया. मगर इन आठ महीनों में बहुत कुछ बदल चुका था. पालीवाल नए माहौल और व्यास की नई कोटरी में सहज नहीं थे. उन्होंने इस्तीफा दे दिया.

1957 के विधानसभा चुनाव में पालीवाल फिर विधायक बने. लेकिन अगले साल नेहरू ने उन्हें राज्यसभा के रास्ते केंद्र में बुला लिया. फिर जयपुर पॉलिटिक्स छूटने लगी 62 में वह हिंडोन से लोकसभा चुनाव जीते. इस लोकसभा का एक सियासी महत्व था. इसी के कार्यकाल में पहले नेहरू गुजरे और फिर शास्त्री. और इसी दौरान पहली बार कांग्रेस संसदीय दल के नेता के लिए चुनाव हुए. एक तरफ इंदिरा, दूसरी तरफ मोरार जी. पालीवाल मोरार जी खेमे में खड़े हुए.

इंदिरा जीतीं, मोरार जी हारे. फिर दो साल बाद राष्ट्रपति चुनाव का झगड़ा हुआ और कांग्रेस बंटी. पालीवाल एंटी इंदिरा खेमे यानी कांग्रेस ओ में गए. 1971 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ओ की दुर्गति हो गई.

फिर इमरजेंसी आई. खत्म हुई तो जनता पार्टी अस्तित्व में आई. और तभी पालीवाल के राजनीतिक दिए में बुझने से पहले की तेजी आई. पुराने सोशलिस्ट मास्टर आदित्येंद्र राजस्थान में जनता पार्टी के अध्यक्ष बने. उनका साथ दिया जनसंघ खेमे के भैरोसिंह शेखावत और टीकाराम पालीवाल ने. जनता पार्टी जीती. शेखावत सीएम बने. पालीवाल फिर नेपथ्य में चले गए.

तीन साल में ये प्रयोग ढेर हो गया. बीजेपी बनी तो शेखावत ने टीकाराम को साथ आने का न्योता दिया. लेकिन तब तक उन्होंने सियासत से संन्यास का बन बना लिया. जिंदगी के आखिरी 15 बरस एक ट्रस्ट बना गरीब बच्चों को पढ़ाने में बीते.

मास्टरी से सब शुरू हुआ था. उसी पर खत्म हुआ.

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