द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर : सिनेमा के किस्से

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द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर. एक ऐसी फिल्म जो न सिर्फ 2004 और 2009 के इलेक्शन के बैकग्राउंड पर आधारित है बल्कि 2019 के इलेक्शन से पहले कांग्रेस की निगेटिव इमेज भी दिखा सकती है.

इस फिल्म का नाम वरिष्‍ठ पत्रकार Sanjaya Baru की किताब ‘The Accidental Prime minister‘ से ही लिया गया है. संजय बारू 2004 से 2008 तक मनमोहन सिंह के मीडिया एड्वाइजर थे. उन्होंने इस किताब को 2014 में पब्लिश किया था, जब UPA सरकार ने सत्ता खो दी थी. इस फिल्म में मनमोहन सिंह का किरदार निभा रहे हैं अनुपम खेर और संजय बारू का किरदार निभा रहे हैं अक्षय खन्ना. सोनिया गांधी के किरदार में सुजेन बर्नेट, राहुल गांधी के किरदार में अक्षय माथुर और प्रियंका गांधी के किरदार में अहाना कुमरा हैं.

एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर किताब भी बेहद विवादित रही है और जैसे ही ट्रेलर आया उसे देखकर ये लग रहा है कि ये फिल्म भी कई विवादों से घिरने वाली है. एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर में न सिर्फ 2004-2013 के बीच हुए घोटालों की जानकारी है बल्कि यह फिल्म यूपीए सरकार के दौरान गांधी परिवार की भूमिका पर से भी पर्दा हटाती है.

संजय बारू मनमोहन सिंह के कार्यकाल में चार साल (मई 2004 से अगस्त 2008) तक उनके मीडिया सलाहकार और चीफ स्पोक्सपर्सन रहे थे. ये किताब उन्होंने अपने उसी दौरान हुए अनुभव पर लिखी है. इस किताब में उन्होंने ज़िक्र किया था कि किस तरह मनमोहन सिंह के काम में कांग्रेस प्रेसिडेंट सोनिया गांधी की दखल होती थी. इसे लेकर काफी विवाद भी हुआ था. ये विवाद इतना बढ़ गया कि पीएमओ ने ऑफिशियली इसकी निंदा करते हुए इसे फिक्शन बता दिया. दूसरी ओर अपनी किताब के बारे में संजय ने कहा था कि वो जितना कुछ जानते हैं उसका सिर्फ पचास फीसदी उन्होंने अपनी किताब में लिखा है.

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फिल्म का एक डायलॉग है, ‘Prime Minister को क्या करना है ये NAC तय करेगी?’ UPA सरकार के दौरान सोनिया गांधी की अध्‍यक्षता में बनाई गई National Advisory Council की ताकत को दिखाता है. किस तरह प्रधानमंत्री को सुझाव देने के नाम पर उस समय कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी का सिक्‍का चलता था. यह फिल्‍म साबित कर देगी कि यूपीए सरकार में सोनिया गांधी ही Shadow Prime Mintser थीं. हां, ये जरूर है कि फिल्‍म डॉक्टर मनमोहन सिंह की भूमिका को जिस तरह से पेश किया गया है, वे मौन नजर नहीं आते. सरकार चलाने में उनके संघर्ष को साफ देखा जा सकता है. साथ ही, न्यूक्लियर डील, कश्मीर मुद्दे जैसे संवेदनशील मामलों पर यह फिल्‍म नई तस्‍वीर प्रस्‍तुत करेगी, जिसे अब तक सिर्फ यूपीए सरकार के हवाले से पेश किया जाता रहा.

किताब और उस पर बनी फिल्म में कितनी समानता है, ये पता लगाने के लिए तो फिल्म की रिलीज़ का इंतज़ार करना पड़ेगा. लेकिन जहां तक ट्रेलर का सवाल है, इसमें उन सारी बातों का ज़िक्र है, जिस पर लोग मनमोहन सिंह का पक्ष सुनना चाहते थे. न्यूक्लीयर डील से लेकर बड़े स्कैम और कश्मीर मुद्दे तक को इसमें उठाया गया है. मनमोहन सिंह और कांग्रेस के बीच आंतरिक दिक्कतों पर भी बात करने की कोशिश की गई है. कैसे एक समय में राहुल गांधी को पार्टी सौंपने के लिए मनमोहन सिंह को दरकिनार करने की कवायद हो रही थी, कुछ सेकंड में लिए ट्रेलर में हमें इसकी भी झलक मिलती है.

इस ट्रेलर को देखकर समझा जा सकता है कि यह फिल्‍म आने वाले राजनीतिक माहौल पर कितना असर डालेगी.

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